इस औषध की क्रिया रक्त,मांस-पेशी और कोशिका के ऊपर होती हैं |चोट लगने ,कुचल जाने अथवा घाव हों जाने पर जैसा दर्द होता हैं ,वैसे ही दर्द का अनुभव सारे शरीर में होना ,जिस शैया पर शयन किया जाय उसका कठोर प्रतीत होना ,मस्तिष्क में जलन होना ,आधे सिर में दर्द होना तथा चेहरे का गर्म होना ,शरीर के अन्य भागो विशेषकर हाथ पावों का ठंढा होना |शरीर पर काले रंग का दाग पडना ,डकारे आना,जीभ से अथवा मल से सड़े-अंडे जैसी दुर्गन्ध आना ,चोट आदि के कारण रक्त-श्राव ,मूर्छा अथवा मोह की अवस्था ,ज्वर के कारण छटपटाना ,शरीर में सडन,चोट लगने अथवा शारीरिक श्रम के कारण उत्पन्न होने वाले रोग ,प्रसव के बाद पक्षाघात हों जाना ,पेशी शूल ,सन्निपातिक ज्वर ,गिरने के कारण होने वाला धनुष्तान्कार रोग ,वात रोग,जीर्ण-मलेरिया रोग ,नाक व् मुख से रक्त श्राव होना ,शय्या-क्षत ,अनजाने में पेशाब निकल जाना आदि लक्षणों में यह औषधि उपयोगी हैं |
चोट लग जाना ,त्वचा छिल जाना ,शरीर में काले दाग पड़ जाना ,गिरने के कारण लगने वाली चोट में इसे "बाह्य प्रयोग की औषधि"के रूप में व्यवहृत कियाजाता हैं |
{सौजन्य से -होम्योपैथी मैटेरिका मेडिका की अनेको पुस्तके }
हिंदी लेखन -इस ब्लॉग के लेखक द्वारा |
चोट लग जाना ,त्वचा छिल जाना ,शरीर में काले दाग पड़ जाना ,गिरने के कारण लगने वाली चोट में इसे "बाह्य प्रयोग की औषधि"के रूप में व्यवहृत कियाजाता हैं |
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